चमार पर्वत

चमार शब्द और सभ्यता का प्राचीन इतिहास: एक विश्लेषण
आमतौर पर यह झूठी और मनगढ़ंत कहानी प्रचारित की जाती है कि 'चमार' शब्द 15वीं सदी में सिकंदर लोदी द्वारा महान गुरु रविदास जी को दिया गया था, जो कि पूरी तरह से असत्य है। जब हम पूरे मानव इतिहास को गहराई से खंगालते हैं, तो वास्तविक हकीकत सामने आती है। सच तो यह है कि चमार शब्द अति प्राचीन है और मूल रूप से इसका चर्मकारी (चमड़े के शिल्प) से कोई लेना-देना नहीं है।
चमार घाटी सभ्यता और भौगोलिक उत्पत्ति
चमार पर्वत शृंखला: दुनिया का सबसे प्राचीन मानव कबीला चमार कबीला है, जो हिमालय की 'चमार पर्वत शृंखला' में निवास करता था। हिमालय के इस क्षेत्र में रहने के कारण अत्यधिक श्वेत (साफ) रंग होने की वजह से इनके लिए 'चामरा' शब्द का प्रयोग होने लगा और यही इस कबीले का नाम बन गया।
सिंधु घाटी सभ्यता का मूल: इसी क्षेत्र से 'चमार घाटी सभ्यता' की शुरुआत हुई, जिसे बाद के इतिहास में 'सिंधु घाटी सभ्यता' के नाम से जाना गया। प्राचीन काल में पूरा एशिया 'चमार द्वीप' कहलाता था।
आदि पुरुष: इस सभ्यता के आदि पुरुष भगवान शिव (शंकर जी) हैं, जिन्हें 'रुद्र सम्राट' या 'पशुपति नाथ' भी कहा जाता था।
चमरी गाय (याक), चंवर और 'चौधरी' शब्द की उत्पत्ति
टोटेम (कबीलाई चिह्न): प्राचीन काल में हर कबीले का एक विशिष्ट 'टोटेम' या पहचान चिह्न होता था (जैसे किसी का मोर, नाग, मीन या कुर्म)। चमार कबीले का पवित्र चिह्न चमरी गाय (याक) था, जिसे देवताओं की गाय भी कहा जाता है।
चंवर की परंपरा: इसी चमरी गाय की पूंछ के बालों से 'चमर्' (चंवर) बनता था, जिसकी पूजा की जाती थी और जो राजसत्ता व सम्मान का प्रतीक था।
चौधरी शब्द का उदय: जब चमार कबीला विभिन्न छोटे कबीलों में विभाजित हुआ, तो उनके मुखिया के पास यह चंवर रखा जाता था। इसी 'चंवरधारी' शब्द से आगे चलकर 'चौधरी' शब्द की उत्पत्ति हुई।

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