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जेम्स प्रिंसेप

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अंग्रेज जेम्स प्रिंसेप ने खोज निकाला सम्राट अशोक का 2000 साल पुराना खोया हुआ इतिहास भारत के इतिहास के बारे में अंग्रेजों को काफी दिलचस्पी थी क्योंकि उन्हें काफी चीजें मिला करती थी जिन्हें न तो वे उन्हें पहचान पा रहे थे और न ही भारत के लोगों को उसकी जानकारी ही थी  अफगानिस्तान* से लेकर *कर्नाटक* तक फैले हुए *सम्राट अशोक* के शिलालेखों को  काफी समय तक कोई पढ़ नहीं पाया था, पहली बार इन शिलालेखों  को पढ़ने में एक अंग्रेज *जेम्स प्रिंसेप* ने सफलता पाई  जेम्स प्रिंसेप अपने पिता के साथ भारत आए थे उन्हें टकसाल में काम मिला था, टकसाल के काम के साथ-साथ उन्हें भारत के इतिहास को जानने की जिज्ञासा थी,  1820 में जेम्स प्रिंसेप का स्थानांतरण बनारस हो गया, यहां पर उन्हें भारत के इतिहास को जानने की समझने का काफी मौका मिला, प्रिंसेप टकसाल में सिक्कों की डिजाइन करने का काम करते थे, उन्हें भारत के बहुत सारे पुराने सिक्के मिलेे  जिनमें कुछ लिखा होता था, किंतु आज तक कोई पढ़ नहीं पाया था ,इन सिक्कों में लिखी इबारत को पढ़ने का सबसे पहले *जेम्स प्रिंसेप* ने प्रयास किया, इ...

मनुस्मृति किसने जलाई

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आज के दिन मनुस्मृति दहन दिवस मनाते हैं मनुस्मृति जलाते हैं बहुजन  समाज के युवा लेकिन आज के वर्तमान समय में आप इस कृत्य से जेल भी जा सकते हैं आपका भविष्य भी बर्बाद किया जा सकता है। वैसे मनुस्मृति जलाने के पीछे सिर्फ बाबा साहब अम्बेडकर जी के नाम को ही आगे लाना एक साजिश के सिवा कुछ नहीं लगता क्योंकि बाबा साहब अम्बेडकर जी के अलावा बाबा साहब अम्बेडकर जी के कई ब्राह्मण और कायस्थ मित्र साथ थे जैसे जी. एन सहस्त्रबुद्धे का नाम नहीं आता? बाबा साहब अम्बेडकर जी के दूसरे मित्र सुधाकर बलवंत कोल्हाटकर का नाम नहीं आता? बाबा साहब अम्बेडकर जी के तीसरे मित्र गोपाल गणेश अगरकर का नाम नहीं आता? बाबा साहब अम्बेडकर जी चौथे मित्र एन जी चंदावरकर का नाम भी नहीं आता? और बाबा साहब अम्बेडकर जी के पांचवें मित्र डी के खैर का नाम भी नहीं आता? जबकि मनुस्मृति जलाने मे यह लोग सहभागिता निभा रहे थे क्योंकि यह भी बाबा साहब अम्बेडकर जी की वैचारिकी से प्रभावित थे । लेकिन ना जाने क्यों इतनी अहम जानकारी को छिपाया गया और बहुजन युवाओं ने भी जानने की कोशिश नहीं की खैर में तो यही कह सकता हूं कि बाबा साहब अम्बेडकर जी...

अनुला देवी महाथेरी

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आज मार्गशीर्ष अमावस्या के दिन रानी अनुला ने आर्य पाली संघमित्रा महाथेरी से धम्म-दीक्षा ली — यही वह ऐतिहासिक क्षण है, जिसकी स्मृति आज श्रीलंका के मिहिन्तले में स्थित अनुला चेत्य(स्तूप) के उत्खनन और पुनरुद्धार के माध्यम से फिर जीवंत हो रही है। मिहिन्तले की हरित, शांत और पवित्र पहाड़ियों के बीच कंकरीली सड़क से जैसे ही इस उत्खनन स्थल पर पहुँचा जाता है, ठोस शिला पर प्रतिष्ठित श्रीलंका की प्रथम भिक्षुणी अनुला देवी महाथेरी की भव्य प्रतिमा आगंतुक का स्वागत करती है। प्रकृति की हरियाली और धम्म की गरिमा यहाँ एक साथ अनुभूत होती है। 25 दिसंबर 2021 को श्रीलंका के पुरातत्व विभाग द्वारा इस ऐतिहासिक स्थल के संरक्षण और पुनर्स्थापन का कार्य औपचारिक रूप से आरंभ किया गया। यह वही स्थल है, जो तीसरी शताब्दी ईसा-पूर्व की महान भिक्षुणी अनुला देवी महाथेरी को समर्पित है — वे प्रथम श्रीलंकाई महिला थीं, जिन्हें बौद्ध भिक्षुणी के रूप में दीक्षा प्राप्त हुई। इस महत्त्वपूर्ण कार्य को नागानंद बौद्ध विश्वविद्यालय के कुलपति एवं ताइवान के मुख्य संघनायक आदरणीय चंदिमा बोडगामा थेरो के सहयोग और पहल से विशेष बल मिल...

चमारों की शान गीतकार शैलेन्द्र

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# महापरिनिर्वाण_पर_शत_शत_नमन      क्या गीतकार शैलेन्द्र को बॉलीवुड में छुपानी पड़ी थी अपनी दलित पहचान? शैलेंद्र एक दलित समुदाय से आते थे इसके बारे में पहली बार राज्यसभा टीवी के ‘मीडिया मंथन’ की एक डिबेट से पता चला जब एक पैनलिस्ट ने इस बात का ज़िक्र किया।तब सोचा कि मैं कितना अनभिज्ञ हूं जो इस बात का मुझे पहले से पता नहीं था। जब इस बारे में गूगल किया तब पता चला कि मैं अकेला ऐसा नहीं हूं। दरअसल शैलेन्द्र के दलित होने की बात पहली बार सार्वजनिक तौर से सामने तब आयी जब उनके बेटे दिनेश शंकर शैलेंद्र ने अपने पिता की कविता संग्रह “अंदर की आग” की भूमिका में ये बात बताई। हालांकि ये बात बहुत से लोगों को नागवार भी गुज़री। अजीब बात है ना जब लोग अपने ब्राह्मण राजपूत होने की बात सीना ठोक कर बताते हैं तो सबको नॉर्मल लगता है लेकिन जब कोई दलित अपनी आइडेंटिटी असर्ट करता है तो उसे जातिवाद का नाम दे दिया जाता है। शैलेन्द्र का असली नाम शंकरदास केसरीलाल था। उन्होंने सिनेमा में आने के लिए अपना तखल्लुस इस्तेमाल किया। दलितों या मुसलमानों को उस वक्त बॉलीवुड में सफल होने के लिए अपने नाम से अ...

संविधान दिवस और संविधान

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भारतीय संविधान पूरी दुनिया में शायद इकलौता ऐसा संविधान है जिसका सीधा टकराव अपने ही सामाजिक मूल्यों से रहा है।  जैसे हमारा संविधान सभी को बराबर मानता है लेकिन समाज एक दूसरे को छोटा-बड़ा मानता है।  संविधान छुआ छूत को अपराध मानता है लेकिन समाज उसे अपनी प्यूरिटी को बचाये रखने के लिए ज़रूरी मानता है।  संविधान वैज्ञानिक सोच विकसित करने की बात करता है लेकिन समाज कर्मकांड को अपना प्राण मानता है।  इसतरह हम कह सकते हैं कि सभी तरह के जातीय, साम्प्रदायिक और लैंगिक संघर्ष में शामिल लोग संविधान के दोनों छोर पर पाए जाने वाले लोग हैं।  और ये संघर्ष दरअसल संविधान को न मानने और मानने वालों के बीच का ही संघर्ष है।  मसलन हिंसा के शिकार दलित चाहते हैं कि उनको संविधान प्रदत अधिकार मिले और हमलावर चाहते हैं कि उन्हें दलितों को पीटने का संविधानपूर्व का पारंपरिक अधिकार अभी भी मिलना जारी रहे।  इसी तरह साम्प्रदायिक हिंसा के शिकार मुसलमान चाहते हैं कि देश संविधान में वर्णित धर्मनिरपेक्ष मूल्यों से चले लेकिन उनके हमलावर चाहते हैं कि देश संविधान विरोधी संघ के इ...

दादा ज्योति राव फुले और बाल गंगाधर तिलक

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बालगंगाधर तिलक और जोतिराव फुले को आमने-सामने रखकर ही ब्राह्मणवादी नायक और बहुजन नायक के बीच के अंतर को साफ़-साफ़ समझा जा सकता है - संदर्भ फुले परिनिर्वाण दिवस (28 नवंबर) सादर नमन के साथ  माली जाति के  जोतीराव फुले((11 अप्रैल 1827, मृत्यु - 28 नवम्बर 1890)और  चितपावन ब्राहमण बाल गंगाधर तिलक(23 जुलाई 1856 - 1 अगस्त 1920)के बीच  तीखा संघर्ष क्यों होता रहा ? दोनों के बीच संघर्ष के कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे मुद्दा नंबर 1- तिलक का मानना था की...जाति पर भारतीय समाज की बुनियाद टिकी है, जाति की समाप्ति का अर्थ है, भारतीय समाज की बुनियाद को तोड़ देना, साथ ही राष्ट्र और राष्ट्रीयता को तो़ड़ना है।  इसके बरक्स फुले....जाति को असमानता की बुनियाद मानते थे और इसे समाप्त करने का संघर्ष कर रहे थे। तिलक ने...फुले को राष्ट्रद्रोही कहा, क्योंकि वे राष्ट्र की बुनियाद जाति व्यवस्था को तोड़ना चाहते थे।( मराठा, 24 अगस्त 1884, पृ.1, संपादक-तिलक ) मुद्दा नंबर - 2 तिलक ने...प्राथमिक शिक्षा को सबके लिए अनिवार्य बनाने के फुले के प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया। उन...

अम्बेडकर पार्क के हाथी बीएसपी का चुनाव निशान या कुछ और

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देखिये आज मैं अपने सभी भाइयों की Confusion दूर करना चाहूँगा । जैसे आज हमारे धीरज जी ये बात बोल रहे हैं कि मायावती जी ने भी तो लखनऊ में मूर्तियां खड़ी की है । तो सुन लीजिये सभी लोग बहन जी ने केवल 600 करोड़ खर्च किये थे । और वो भी इसलिये क्योंकि पूरे भारत में कही भी बहुजन समाज का कोई भी ऐतिहासिक Place नहीं था । तो फिर मेरे हिसाब से बहुजन समाज का भारत देश में कोई अस्तित्व नहीं रह जाता ।  जिस समाज का कोई ऐतिहासिक जान-पहचान ना हो उस समाज का अस्तित्व कैसे रह जाएगा । और इसी वजह से बहन जी ने बहुजन समाज का भी कोई Place हो ये सोचकर बहन जी ने लखनऊ में अंबेडकर पार्क का निर्माण किया । और जिसका खर्चा मोदी जी की तुलना में 6 गुना कम है मोदी जी ने लगभग साढ़े तीन हजार करोड़ रूपये खर्च किये है सरदार पटेल की मूर्ति में । जबकि बहन जी ने केवल छः सौ करोड़ ही खर्च किये ।  और 600 करोड़ कोई फिजूल खर्च नही किये । उससे भी सरकार को ही फायदा है । जिस तरह ताजमहल से 1 साल में 22 से 25 करोड़ रुपये की इनकम होती है । उसी तरह लखनऊ अंबेडकर पार्क से भी सरकार कमाई कर रही है । फिर बहन जी...