अनुला देवी महाथेरी
आज मार्गशीर्ष अमावस्या के दिन रानी अनुला ने आर्य पाली संघमित्रा महाथेरी से धम्म-दीक्षा ली —
यही वह ऐतिहासिक क्षण है, जिसकी स्मृति आज श्रीलंका के मिहिन्तले में स्थित अनुला चेत्य(स्तूप) के उत्खनन और पुनरुद्धार के माध्यम से फिर जीवंत हो रही है।
मिहिन्तले की हरित, शांत और पवित्र पहाड़ियों के बीच कंकरीली सड़क से जैसे ही इस उत्खनन स्थल पर पहुँचा जाता है, ठोस शिला पर प्रतिष्ठित श्रीलंका की प्रथम भिक्षुणी अनुला देवी महाथेरी की भव्य प्रतिमा आगंतुक का स्वागत करती है। प्रकृति की हरियाली और धम्म की गरिमा यहाँ एक साथ अनुभूत होती है।
25 दिसंबर 2021 को श्रीलंका के पुरातत्व विभाग द्वारा इस ऐतिहासिक स्थल के संरक्षण और पुनर्स्थापन का कार्य औपचारिक रूप से आरंभ किया गया। यह वही स्थल है, जो तीसरी शताब्दी ईसा-पूर्व की महान भिक्षुणी अनुला देवी महाथेरी को समर्पित है — वे प्रथम श्रीलंकाई महिला थीं, जिन्हें बौद्ध भिक्षुणी के रूप में दीक्षा प्राप्त हुई।
इस महत्त्वपूर्ण कार्य को नागानंद बौद्ध विश्वविद्यालय के कुलपति एवं ताइवान के मुख्य संघनायक आदरणीय चंदिमा बोडगामा थेरो के सहयोग और पहल से विशेष बल मिला। स्थल पर चल रहे उत्खनन का नेतृत्व श्रीलंका के पुरातत्व विभाग के समर्पित अधिकारी श्री ए. ए. विजयरथ्ने कर रहे हैं, जिनका अथक परिश्रम इस परियोजना की आत्मा है।
मिहिन्तले राजमहाविहार के वक्तव्य के अनुसार, इस ऐतिहासिक अवसर पर विभिन्न बौद्ध परंपराओं के धम्म आचार्य, संघ प्रतिनिधि तथा श्रीलंका सहित अनेक देशों के गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे। वर्तमान में उत्खनन का अंतिम चरण प्रगति पर है।
इतिहास में झाँकें तो अनुला देवी, श्रीलंका के महान राजा देवानंपियतिस्स (247–207 ईसा-पूर्व) की भाभी थीं। उन्होंने अपने सखी-समूह सहित राजप्रासाद में आयोजित महिंदा थेर — सम्राट अशोक के पुत्र — के धम्म उपदेश सुने। महावंश के अनुसार, उन उपदेशों से प्रेरित होकर अनुला देवी और अन्य स्त्रियों ने भिक्षुणी दीक्षा की प्रबल इच्छा प्रकट की, यहाँ तक कि राजा से दृढ़ आग्रह भी किया।
किन्तु महिंदा थेर ने राजा को स्पष्ट किया—
“हे महाराज, हमारे लिए स्त्रियों को दीक्षा देना विनय के अनुसार अनुमत नहीं है।”
फिर उन्होंने आगे कहा कि भारत में उनकी कनिष्ठ बहन संघमित्रा थेरी, जो अनुभवी भिक्षुणी हैं, यहाँ आएँगी और उनके साथ अन्य विख्यात भिक्षुणियाँ भी होंगी। वही संघमित्रा थेरी इन स्त्रियों को उपसंपदा प्रदान करेंगी।
लंबी प्रतीक्षा के पश्चात संघमित्रा थेरी का श्रीलंका आगमन हुआ और तभी रानी अनुला तथा राजपरिवार की अन्य स्त्रियों को भिक्षुणी संघ में दीक्षित किया गया।
अनुला आज मार्गशीर्ष अमावस्या के दिन रानी अनुला ने आर्य पाली संघमित्रा महाथेरी से धम्म-दीक्षा ली —
यही वह ऐतिहासिक क्षण है, जिसकी स्मृति आज श्रीलंका के मिहिन्तले में स्थित अनुला चेतिya (स्तूप) के उत्खनन और पुनरुद्धार के माध्यम से फिर जीवंत हो रही है।
मिहिन्तले की हरित, शांत और पवित्र पहाड़ियों के बीच कंकरीली सड़क से जैसे ही इस उत्खनन स्थल पर पहुँचा जाता है, ठोस शिला पर प्रतिष्ठित श्रीलंका की प्रथम भिक्षुणी अनुला देवी महाथेरी की भव्य प्रतिमा आगंतुक का स्वागत करती है। प्रकृति की हरियाली और धम्म की गरिमा यहाँ एक साथ अनुभूत होती है।
25 दिसंबर 2021 को श्रीलंका के पुरातत्व विभाग द्वारा इस ऐतिहासिक स्थल के संरक्षण और पुनर्स्थापन का कार्य औपचारिक रूप से आरंभ किया गया। यह वही स्थल है, जो तीसरी शताब्दी ईसा-पूर्व की महान भिक्षुणी अनुला देवी महाथेरी को समर्पित है — वे प्रथम श्रीलंकाई महिला थीं, जिन्हें बौद्ध भिक्षुणी के रूप में दीक्षा प्राप्त हुई।
इस महत्त्वपूर्ण कार्य को नागानंद बौद्ध विश्वविद्यालय के कुलपति एवं ताइवान के मुख्य संघनायक आदरणीय चंदिमा बोडगामा थेरो के सहयोग और पहल से विशेष बल मिला। स्थल पर चल रहे उत्खनन का नेतृत्व श्रीलंका के पुरातत्व विभाग के समर्पित अधिकारी श्री ए. ए. विजयरथ्ने कर रहे हैं, जिनका अथक परिश्रम इस परियोजना की आत्मा है।
मिहिन्तले राजमहाविहार के वक्तव्य के अनुसार, इस ऐतिहासिक अवसर पर विभिन्न बौद्ध परंपराओं के धम्म आचार्य, संघ प्रतिनिधि तथा श्रीलंका सहित अनेक देशों के गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे। वर्तमान में उत्खनन का अंतिम चरण प्रगति पर है।
इतिहास में झाँकें तो अनुला देवी, श्रीलंका के महान राजा देवानंपियतिस्स (247–207 ईसा-पूर्व) की भाभी थीं। उन्होंने अपने सखी-समूह सहित राजप्रासाद में आयोजित महिंदा थेर — सम्राट अशोक के पुत्र — के धम्म उपदेश सुने। महावंश के अनुसार, उन उपदेशों से प्रेरित होकर अनुला देवी और अन्य स्त्रियों ने भिक्षुणी दीक्षा की प्रबल इच्छा प्रकट की, यहाँ तक कि राजा से दृढ़ आग्रह भी किया।
किन्तु महिंदा थेर ने राजा को स्पष्ट किया—
“हे महाराज, हमारे लिए स्त्रियों को दीक्षा देना विनय के अनुसार अनुमत नहीं है।”
फिर उन्होंने आगे कहा कि भारत में उनकी कनिष्ठ बहन संघमित्रा थेरी, जो अनुभवी भिक्षुणी हैं, यहाँ आएँगी और उनके साथ अन्य विख्यात भिक्षुणियाँ भी होंगी। वही संघमित्रा थेरी इन स्त्रियों को उपसंपदा प्रदान करेंगी।
लंबी प्रतीक्षा के पश्चात संघमित्रा थेरी का श्रीलंका आगमन हुआ और तभी रानी अनुला तथा राजपरिवार की अन्य स्त्रियों को भिक्षुणी संघ में दीक्षित किया गया।
अनुला चेत्य का पुनरुद्धार केवल एक पुरातात्त्विक कार्य नहीं, बल्कि विश्व इतिहास में नारी-धम्म स्वतंत्रता की एक अमिट स्मृति का पुनर्जागरण है।
अनुला देवी महाथेरी वह प्रथम महिला थीं, जिन्हें अशोक साम्राज्य की सीमाओं के बाहर बौद्ध भिक्षुणी दीक्षा प्राप्त हुई — यह घटना बौद्ध इतिहास में करुणा, समानता और प्रज्ञा की अनुपम मिसाल है। का पुनरुद्धार केवल एक पुरातात्त्विक कार्य नहीं, बल्कि विश्व इतिहास में नारी-धम्म स्वतंत्रता की एक अमिट स्मृति का पुनर्जागरण है।
अनुला देवी महाथेरी वह प्रथम महिला थीं, जिन्हें अशोक साम्राज्य की सीमाओं के बाहर बौद्ध भिक्षुणी दीक्षा प्राप्त हुई — यह घटना बौद्ध इतिहास में करुणा, समानता और प्रज्ञा की अनुपम मिसाल है।
Comments
Post a Comment