बुद्ध ही शिव हैं
*महाशिवरात्रि❓सत्य पुरात्विक दृष्टि से ✍️
बौद्ध धरोहर और स्थापत्य कला, यह विषय आम जनता के लिए जटिल है। आज जिसे शिव-शंकर कहते है वास्तविक वह ऐतिहासिक थे ? या बुद्ध को ही अपभ्रंश बनाकर उन्हें शिवशंकर बना दिया❓
शिव-शंकर को हिंदू प्रथम, मध्य और अंतिम, सब कुछ मानते हैं।यह लेख लिखने की जिज्ञासा इसलिए प्रकट हुई, एक बार बाला घाट मध्यप्रदेश गया था। रास्ते से जा रहा था। दुर्गा के पंडाल सजे थे। अचानक शिव मंदिर पर ध्यान गया वहां लिखा था *मृत्युंजय* मन ही मन मे हलचल मची और सोच रहा था कि जिसने अपने जरा-मरण पर विजय पा ली वह *मृत्युंजय* हो गया👈
शंकर को मृत्युंजय महादेव कहा जाता है। अर्थात जिसने मृत्यु पर विजय प्राप्त की वह अरहंत हो जाता है। शिवपुराण में उसे हर-हर महादेव कहा जाता है। वह मूलतः अर्हत्व का ही द्योतक है👈
बौद्ध साहित्य में ऐसी परंपरा है कि 'मार विजय' होने पर ही संबोधि प्राप्त होती है। सिद्धार्थ गौतम ने बोधगया में पीपल के वृक्ष के नीचे वैशाख पूर्णिमा को 'मार विजय' प्राप्त की थी और 'बुद्ध' कहलाए। अर्थात *मृत्युंजय कहलाये👈
इसी प्रकार शंकर को मारकण्डेय महादेव कहा जाता है। जिसके जीवन में 'मार-काण्ड' पर विजय प्राप्त की। शंकर को स्वयंभू नाथ (शम्भुनाथ) भी कहा जाता है👈
वास्तविक सत्य यह है कि शंभूनाथ का अर्थ सम्यक सम्बुद्ध है। इस नाम से काठमांडू में बहुत प्रसिद्ध मंदिर है। जो सम्यक सम्बुद्ध होते है उनका कोई गुरु नही होता है, इसी कारण उसे भी 'स्वयंभू' अर्थात सम्यक सम्बुद्ध कहा जाता है👈
*बिहार में कावड़ी यात्रा के समय शंकर के भक्त परंपरा के अनुसार 'बम-बम बोल' का उच्चारण करते हैं। अर्थात 'बम-बम बोल' का तात्पर्य 'धम्म-धम्म बोल' से है👈
शंकर को परम ध्यानी कहा गया है। हिमालय में उन्होंने तपस्या की थी, उनकी शक्ति को 'पार्वती' कहा गया है। शंकर को तीन नेत्रधारी कहा गया है। तीसरा नेत्र उनका 'बोधिनेत्र' है, जिसके माध्यम से उन्होंने संसार की अनित्यता का साक्षात अनुभव किया👈
वास्तविक सत्य यह है कि तथागत बुद्ध ने हिमालय की कन्द्राहो में ध्यान किया था। एव तथागत बुद्ध को बोधि प्राप्त होने से पहले पाँच प्रकार के सपन पड़े थे, उन्होंने प्रथम सपन में देखा कि उनका सर हिमालय पर है। आज इसे नेपाल में माथाकुवर पर्वत के नाम से जाना जाता है बूद्ध को दिव्यचक्षु प्राप्त थे जिसे शंकर का तीसरा नेत्र बना दिया गया। एवं बूद्ध के पास 10 प्रकार की ऋद्धि-सिद्धि थी। वह उनकी शक्ति थी👈
शंकर को 'त्रिशूलधारी' कहा जाता है। यह 'तिरत्न' अर्थात बुद्ध, धर्म-संघ का प्रतीक है। शंकर की सवारी बैल है। वास्तविक बुद्ध में धम्म संचरण का उत्साह बहुत था। बैल उत्साह का प्रतीक है। और बैल यह प्रतीक हमे सारनाथ के अशोक स्तम्भ पर मिलता है👈
शंकर ने संसार के विष का पान कर लिया था, लेकिन वह कंठ तक ही रह गया। इसका तात्पर्य यह है कि जितनी भी सांसारिक दुष्प्रवृत्तियां हैं, उन्हें शंकर ने कभी ग्रहण नहीं किया। वह परम शुद्ध थे। सबके लिए कल्याणकारी थे👈
वास्तविक सत्य यह है कि तथागत बुद्ध ने संसार की दुष्प्रवृत्तियों का कभी पान नही किया। वह कंठ तक ही रह गया। तथागत परम शुद्ध थे। परम् कल्याणकारी थे👈
शंकर के गले में सर्प लिपटा रहता है, किन्तु वह उनका अनिष्ट नहीं कर पाता। यहां सर्प भी संसार की दुष्प्रवृत्तियों का प्रतीक है। जिससे शंकर विचलित नही होते👈
वास्तविक सत्य तथागत बुद्ध के सर पर नाग प्रतीक है वह उसी का घोतक है। जिससे तथागत विचलित नहीं हुए। यह भी कहा जाता है कि शंकर नरमुण्ड की माला पहनते हैं। वास्तव में यह बुद्ध के अनित्यवाद का प्रतीक है👈
शंकर के विषय में ऐसी भी परिकल्पना है कि उनके सिर पर चंद्रमा विराजमान है तथा सिर से ही गंगा निकली होती है। यह शंकर के शांत और शीतल हृदय का प्रतीक है। वास्तविक सत्य यह है कि तथागत 'बुद्ध' के सर पर चौबीसों घंटे आभा मंडल चमकता था।
काशी को 'शिव धाम' कहा गया है। वास्तविक सत्य यह है कि तथागत बुद्ध काशी आकर सारनाथ से अपने धम्म(र्म) का प्रवर्तन किया।
शिव का प्रतीक लिंग के रूप में माना जाता है। वास्तविक सत्य यह है कि लिंग यह तथागत बुद्ध के 'वीर्य' पारमिता का द्योतक है। इस पारमिता को तथागत बुद्ध ने सर्वप्रथम प्राप्त किया। शंकर के साथ भूत-प्रेत भी रहते हैं। वास्तविक सत्य यह है कि तथागत बुद्ध का धर्म प्रचार इतना व्यापक था कि अमानवीय तत्व भी उनसे प्रभावित होते है। जैसे नालागिरी हाथी।
अंततः कलम को विराम देने से पहले इतनाही कहना चाहूंगा कि ऐतिहासिक तथागत बुद्ध के पुरात्विक अवशेष धरती के हर कोने में मिलते है। किन्तु शंकर की जकड़न के अवशेष कही नही पाए गए। इसपर विषय पर नए सिरे से अध्ययन की जरूरत है।
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