* Deviation from ideology * * (विचारधारा से भटकना) * अर्थात * वामन का असली बामन-अवतार * 1) साल 1984 में पहले सामाजिक जागृति जरुरी हैं बताकर मा. कांशीराम साहब के द्वारा चलाए सामाजिक-राजनैतिक आंदोलन (BSP) की मजाक करने वाले वामन ने 40 साल की (अ)सामाजिक विफलता के बाद खुद राजनैतिक पार्टी (BMP) बनायी। मा. कांशीराम साहब की मेहनत से 1984 से ही विधानसभा में 10,000 वोट लेने वाली सामाजिक-राजनैतिक पार्टी(BSP) का मजाक उड़ाने वाले वामन की खट़िया 40 साल की (अ)सामाजिक (कु) क्रांति के बाद भी 40 वोटों पर खड़ी हो गयी। राजनैतिक आंदोलन का विरोध कर BAMCEF का रजिस्ट्रेशन(?) करने और उसके ऊपर एकाधिकार करने कोई भी कसर नहीं छोड़ी। अगर वामन को 40 सालों में 40 वोट लेने वाली राजनैतिक(मौकापरस्त) पार्टी बनानी थी तो 35 साल पहले 10,000 वोट लेने वाली बसपा का विरोध करने का कारण क्या था? 2) बहन मायावती को धन बटोरने वाली कहकर बदनाम करने कोई कसर नहीं छोड़ने वाली व्यवस्था के दलाल मिडिया के इशारे पर वामन ने पुरी मौकापरस्ती की और खुद बहुजन समाज को लुटने के लिए 60 दुकानें लगाकर बैठ़ गया। 3) बसपा में बामनों का विरोध...
बसपा को समर्थन ना करके बौद्ध अनुयायी अपने धम्म को सीमित रखना चाह्ते है या रात के अंधेरे में मनुवादी पार्टियों के लिए काम करते है ???? जो लोग अपने आप को तथागत बुद्ध के अनुयायी मानते है ये लोगों को बहन मायावती के शासन काल में बने बुद्ध स्मारकों को याद करना चाहिये। बहनजी के शासन काल में उत्तर प्रदेश के बुद्धिस्ट सरकिट वाली बुक को अवश्य पढ़ना चाहिए। आज़ादी के इतने सालों के बाद बौद्ध धम्म को पहलीबार किसी राज्य सरकार ने महत्व दिया है तो वो बहनजी की सरकार ने कर के दिखाया है। उतना ही नहीं, मौर्य शासनकाल के बाद बौद्ध स्मारकों का सृजन अगर किसी समय में हुआ है तो बहनजी की सरकार में हुआ है। वो चाहे इंटर नेशनल बौद्ध सरकिट F1 रेस हो, या गौतम बुद्ध यूनिवर्सिटी हो, या तथागत बुद्ध की माता महामाया के नाम से या खुद गौतम बुद्ध के नामक जिले का सर्जन हो ऐसे अनेकों काम है जो बहनजी की सरकार में हुआ है। किसी भी धर्म को फूलने फ़ालने के लिए राज्याश्रय मिलना अति जरूरी है। भारत में राज्याश्रय के अभाव में बौद्ध धम्म को भारी हानि पहुँची है ये तो सभी बौद्ध अनुयायियों को स्वीकार करना ही पड़ेगा। फिर भी अगर आप लोग कांग्रेस क...
बोधिसत्व संत रैदास 🤔 (माघ पूर्णिमा के दिन भगवान ने अनत्त सञ्ञ सुत्त का संगायन किया था और इसी पूर्णिमा के दिन वैशाली के चौपाल चैत्य में तथागत बुद्ध ने सकल जगत को स्तब्ध कर देने वाली घोषणा की थी- तीन माह बाद तथागत महापरिनिर्वाण को उपलब्ध होंगे👈 और माघ पूर्णिमा के दिन दिन ही संत रैदास का जन्म हुआ है। जन्म भी वहाँ हुआ जहाँ तथागत ने प्रथम धम्मोपदेश किया, वाराणसी में। संत रैदास बुद्ध धम्म की एक धारा हैं👈 संत रैदास जयंती के अवसर पर दिया गया एक व्याख्यान पुनः उद्धृत कर रहा हूँ।) संत रैदास बुद्ध धम्म की एक धारा हैं। प्रत्यक्ष रूप से वह बौद्ध नहीं दिखते हैं लेकिन गहन विवेचना उनको सीधे बुद्ध धम्म से जोड़ती है👈 उनका जन्म उस समय हुआ, 15वीं शताब्दी में, जब बुद्ध का धम्म भारत से क्रमिक रूप से लुप्त हो हुआ दिखाई दे रहा था, लेकिन वास्तव में उससे नये सम्प्रदायों का जन्म हो रहा था , जो प्रत्यक्ष रूप से नये सम्प्रदाय दिख रहे थे लेकिन उनकी मौलिक जड़ें बुद्ध धम्म में थीं👈 बौद्ध धर्म का एक सम्प्रदाय सहजयान बन चुका था। इसी सहजयान से भक्ति सम्प्रदाय का जन्म हुआ जिसके उल्लेखनीय प्रकट व्यक्...
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