Dalit History Of India

1881 के जनगणना के समय बिहार कोई राज्य नहीं था । आज का बिहार उस समय बंगाल था । उस जनगणना में दर्ज है कि बंगाल के चंडाल का एक भाग है दुसाध । दुसाध और चंडाल एक ही तरह की जाति है । यह बात अंग्रेज अधिकारियों ने जनगणना रिपोर्ट में दर्ज की है ‌।‌उस समय ऐसा नहीं था कि जातियों का कोई स्वार्थ था , कोई राजनीति थी ‌‌। जो सच अंग्रेज को पता चला ,उन्होनें दर्ज किया ।‌

अब बौद्धों के महाग्रंथ महावंश का लिखा माने तो कोशल का महाप्रतापी राजा प्रसेनजीत चंडाल था ।‌ चूँकि चंडाल जाति बिहार और पूर्वी यूपी में नहीं पायी जाती है यहां दुसाध जाति पायी जाती है ।‌ इसलिए यह भी कह सकते हैं कि प्रसेनजीत आज रहता तो उसे दुसाध कहा जाता ।

हमारे यहां चंडाल का अर्थ निकलता है ऐसा व्यक्ति जिसे काबू न किया जा सके । अगर कोई किसी का बात असानी से नहीं मानता तो उसे लोग चंडाल कह गाली देते हैं ।‌

दु:साध्य और दुसाध  का शाब्दिक अर्थ यहीं होता है ।

ब्राह्मण और बौद्ध ग्रंथों में चंडाल की बहुत तरह की चर्चा है । चंडाल अगर किसी शहर में प्रवेश करते थे तो उन्हें छड़ी पीटते हुए चलना पड़ता था ,जिससे लोग को पता चले की चंडाल आ रहा है ।

चंडाल कौन थे ,क्या थे ,उनका इतिहास क्या था ,कहीं इसका उल्लेख नहीं मिलता । विकिपीडिया पर भी नहीं है - जहां हर ऐरे - गैरे का भी इतिहास बहुत शानदार ढंग से दर्ज रहता है ।‌

चंडाल जरुर चंड से बना होगा , चंड से चंडी बना है और चंडी से चंडीगढ़ । हरि से हरियाणा बना है । हरि एक जाति है जिसे डोम भी कहते हैं ।‌ हरियाणा की राजधानी चंडीगढ़ है ।‌ उसी हरियाणा में राखीगढ़ी है , जहां सिंधु - घाटी के अवशेष मिले हैं ।‌ उस अवशेष की अस्थियों में कथित आर्य या यूरेशियन प्रजाति का कोई डी एन ए नहीं मिलता । 

वहीं चंडी , काली भी हैं जो पूरे बंगाल की सबसे अराध्य देवी है । 

चंडाल का इतिहास दबा है , कोई एंटीक्वीटी अवशेष नहीं बचा है । बंगाल के चंडाल खुद को नामशूद्र कहने लगे । जो भी बचा - खुचा था ,वह भी बह - दह गया । 

सवाल है अब चंडाल का इतिहास कोई खोजना चाहे तो कहां से खोज सकता है ‌ ।

किसी का इतिहास नही है ,तो उसका विकास की कड़ी खत्म हो जाती है और वह हमेशा गुलामी को अभिशप्त हो जाता है ‌

इतिहास न होने का दर्द दलितों से ज्यादा कौन समझ सकता है ?

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